Category: politics
Published: December 16, 2024
उस्ताद जाकिर हुसैन, भारतीय संगीत जगत के दिग्गज तबला वादक, अब हमारे बीच नहीं रहे। उनका निधन एक अप्रत्याशित घटना के रूप में हुआ, जैसे किसी कार्यक्रम के अंत में द्रुत लय की प्रस्तुति। बीमारी ने दुआओं का असर दिखाने का समय भी नहीं दिया, और भारतीय शास्त्रीय संगीत का एक बड़ा अध्याय समाप्त हो गया। 50 के दशक की बात है जब उस्ताद अल्लारखा तबले के प्रसिद्ध वादक बन चुके थे और उस दौर के कई प्रमुख कलाकारों के साथ उन्होंने संगत की थी। इसके बाद पंडित रविशंकर के साथ उनकी जोड़ी बनी और इस जोड़ी ने भारतीय संगीत के ग्लोबल स्तर पर लोकप्रिय होने का रास्ता खोला। पंडित रविशंकर और उस्ताद अल्लारखा का संगत ऐसा था जैसे दोनों एक-दूसरे की बात समझते हों। इस दौरान उस्ताद अल्लारखा ने जाकिर हुसैन को संगीत की तालीम दी, और उनकी पहचान बनी, जो आगे चलकर संगीत की दुनिया में एक नई क्रांति लेकर आई।
एक कार्यक्रम के दौरान, जब उस्ताद अली अकबर खान और उस्ताद अल्लारखा मंच पर थे, तब 7-8 साल के जाकिर हुसैन भी अपने पिता के साथ बैठे थे। जब अली अकबर खान ने जाकिर हुसैन को तबला बजाने के लिए कहा, तो उस दिन का संगीत का अनुभव कुछ अलग ही था। इसके बाद उस्ताद जाकिर हुसैन ने संगीत की दुनिया में अपनी एक अनूठी पहचान बनाई और भारतीय संगीत के ‘ग्लोबल एम्बेसडर’ के रूप में प्रसिद्ध हुए। उनका निधन भारतीय संगीत के लिए अपूरणीय क्षति है, और उनकी जगह अब कभी नहीं भरी जा सकती।
जाकिर हुसैन का संगीत के प्रति समर्पण बेमिसाल था। शास्त्रीय संगीत में तबले को अक्सर संगत वाद्य के रूप में देखा जाता था, लेकिन उस्ताद जाकिर हुसैन ने इसे सोलो वाद्य के रूप में प्रस्तुत किया। उनके सोलो कार्यक्रमों में दर्शकों की भीड़ हमेशा उमड़ती थी। उन्होंने देश-विदेश के अनेक बड़े कलाकारों के साथ जुगलबंदी की। पंडित बिरजू महाराज से लेकर पंडित शिवकुमार शर्मा तक के साथ उनके अद्भुत कार्यक्रम रहे। जाकिर हुसैन की लोकप्रियता अपनी अलग ही मिसाल थी, और अपने गुरु उस्ताद अल्लारखा से भी वे आगे बढ़ गए थे, लेकिन हमेशा उन्हीं की दी हुई सहजता और संस्कारों को बनाए रखा।
जाकिर हुसैन का संगीत में प्रयोग करने का तरीका भी अनोखा था। वे इंटरनेट के दौर में अपने कार्यक्रमों के वीडियो से दर्शकों को अद्भुत अनुभव देते थे। हाल ही में उनका एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें उन्होंने तबले पर डमरू, ट्रेन की आवाज, बिजली का कड़कना और घोड़े की टापों की आवाज़ को सहजता से प्रस्तुत किया। उनके लिए तबला सिर्फ एक वाद्य नहीं, बल्कि एक भाषा था, जिससे वह ध्वनियों को एक नई परिभाषा देते थे। 1987 में उनका पहला सोलो एलबम मेकिंग म्यूजिक आया, जो वेस्टर्न इंस्ट्रूमेंट के साथ उनकी जुगलबंदी को प्रदर्शित करता था। 1988 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया, और उनकी उम्र उस समय महज 37 साल थी। इसके बाद उन्होंने कई फिल्मों में संगीत दिया और उन्हें विश्वभर में पहचान मिली। उनकी कड़ी मेहनत और संगीत के प्रति समर्पण ने उन्हें प्रतिष्ठित ग्रैमी अवार्ड दिलवाया, जिसे उन्होंने दो बार प्राप्त किया।
मई 2022 में पंडित शिवकुमार शर्मा के निधन के बाद, उस्ताद जाकिर हुसैन ने उन्हें अंतिम सम्मान दिया। उनके और पंडित शिवकुमार शर्मा के बीच का संबंध सिर्फ कलाकारों का नहीं था, बल्कि दोनों के वाद्य ऐसे होते थे, जैसे वे आपस में संवाद कर रहे हों। यह एक अद्वितीय मिलन था, जो श्रोताओं को हमेशा याद रहेगा। उस्ताद जाकिर हुसैन का संगीत, उनकी सरलता और उनका व्यक्तित्व संगीत जगत के लिए एक अमूल्य धरोहर बन गया है। उनकी शिक्षा, उनके संगीत के प्रति समर्पण और उनके योगदान को कभी नहीं भुलाया जा सकेगा। आज उनका जाना भारतीय संगीत के लिए एक बड़ी क्षति है, लेकिन उनका योगदान सदा जीवित रहेगा।
Writer: neelamsingh116
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