Category: politics
Published: December 13, 2024
संविधान के लागू होने के बाद 1951-52 में भारत में पहली बार चुनाव आयोजित किए गए थे। उस समय लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए गए थे, जो कि नीति निर्माताओं के दूरदर्शिता को दर्शाता है। यह चुनाव प्रक्रिया उस समय के लिए एक महत्वपूर्ण कदम था, जिससे सरकार के गठन और नीति निर्धारण में एक स्थिरता आई। हालांकि, 1967 के बाद से यह परंपरा टूटने लगी, और चुनावों के आयोजन में असंगतता आ गई। कभी राज्य विधानसभा को भंग करना पड़ा, तो कभी लोकसभा चुनावों को पहले ही करवा लिया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि अब भारत में हर साल किसी न किसी राज्य में चुनाव होते हैं।
अब, नरेंद्र मोदी सरकार इस परंपरा को फिर से स्थापित करने की दिशा में कदम बढ़ा रही है। यदि सब कुछ सही रहा तो 2029 में पहली बार देशभर में एक साथ लोकसभा, राज्य विधानसभा और स्थानीय निकाय चुनाव होंगे। इसका उद्देश्य यह है कि चुनावों का आयोजन एक साथ किया जाए, जिससे न केवल चुनावी खर्च में कमी आए, बल्कि प्रशासनिक बोझ भी कम हो।
हालांकि, इस पर अमल करना उतना आसान नहीं होगा। इसके लिए संविधान में संशोधन की आवश्यकता होगी, और इसके लिए केंद्र सरकार को दो तिहाई बहुमत प्राप्त करना होगा। अगर राज्यों की सहमति की आवश्यकता पड़ी, तो विपक्षी दलों के नेतृत्व वाले राज्यों से कुछ चुनौतियां उत्पन्न हो सकती हैं, क्योंकि उन्हें यह कदम स्वीकार करना आसान नहीं होगा। फिर भी, सरकार इसे लेकर गंभीर है और यह चर्चा शीतकालीन सत्र में संसद में पेश की जा सकती है।
दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में पहली बार इस विचार को प्रमुखता से उठाया था जब वे प्रधानमंत्री बने थे। उन्होंने इसे देश की वर्तमान और भविष्य की जरूरत बताया था, क्योंकि बार-बार चुनावों के कारण देश की विकास प्रक्रिया में अवरोध उत्पन्न होता है। उनका कहना था कि लगातार चुनावों के कारण केंद्र और राज्य सरकारों के सामने विकास कार्यों को प्राथमिकता देने में कठिनाई होती है, जिससे देश की प्रगति पर प्रतिकूल असर पड़ता है। 2015 में लॉ कमीशन ने भी इस प्रस्ताव को समर्थन दिया था और सुझाव दिया था कि एक साथ चुनाव कराने से सरकारों की कार्यप्रणाली में सुधार हो सकता है और इससे सरकारी खर्चों में भी बड़ी बचत हो सकती है। इसके अलावा, इसे लेकर अनेक अन्य फायदे भी सामने आए थे, जैसे चुनावी प्रक्रिया को अधिक प्रभावी और समयबद्ध बनाना।
प्रधानमंत्री मोदी के इस विचार पर 2019 में पुनः गंभीरता से चर्चा शुरू हुई, जब उन्होंने अपनी दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद सभी राजनीतिक दलों से विचार-विमर्श किया था। हालांकि, इस समय भी कोई ठोस निर्णय नहीं हो सका था। इसके बावजूद, सरकार ने यह मुद्दा छोड़ने का नाम नहीं लिया और 2023 में इस पर और भी अधिक ध्यान केंद्रित किया।
सितंबर 2023 में पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया गया, जिसमें वकील हरीश साल्वे, गृह मंत्री अमित शाह, कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी, डीपीए पार्टी के नेता गुलाम नबी आजाद और तीन पूर्व अफसर भी शामिल थे। इस कमेटी ने इस विषय पर गहन विचार-विमर्श किया और मार्च 2024 में अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सौंप दी। अब केंद्रीय कैबिनेट ने इस रिपोर्ट को मंजूरी दी है और यह बिल शीतकालीन सत्र में पेश किए जाने की संभावना है। सरकार की योजना है कि इस बिल को चर्चा के बाद जॉइंट पार्लियामेंट्री कमेटी (जेपीसी) के पास भेजा जाए, ताकि सभी दलों की सहमति प्राप्त की जा सके और इसे पारित करवाने में कोई अड़चन न आए।
इसके बाद अगर यह बिल संसद में पारित होता है तो 2029 में पहली बार भारत में वन नेशन-वन इलेक्शन (एक राष्ट्र-एक चुनाव) की व्यवस्था लागू हो सकेगी, जिससे देश के चुनावी माहौल में स्थिरता आएगी और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को भी और अधिक प्रभावी बनाया जा सकेगा।
Writer: neelamsingh116
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