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आरिफ मोहम्मद खान बने बिहार के नए राज्यपाल: बीजेपी की मुस्लिम राजनीति का प्रगतिशील चेहरा.

Category: politics

Published: December 25, 2024

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राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने हाल ही में राज्यपालों की नई नियुक्तियों की घोषणा की है, जिसमें केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान को बिहार का राज्यपाल बनाया गया है। इस नियुक्ति के साथ ही आरिफ मोहम्मद खान को एक बार फिर राज्यपाल के रूप में सेवा देने का अवसर मिला है। उनके अलावा पूर्व गृह सचिव अजय कुमार भल्ला को मणिपुर, जनरल वीके सिंह को मिजोरम, और हरि बाबू को ओडिशा का राज्यपाल नियुक्त किया गया है। वहीं, बिहार के पूर्व राज्यपाल राजेंद्र आर्लेकर को केरल की जिम्मेदारी दी गई है।

बुलंदशहर के गांव मोहम्मदपुर बरनाला में 1951 में जन्मे आरिफ मोहम्मद खान ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) से अपनी शिक्षा पूरी की। यहीं से उनके राजनीतिक करियर की शुरुआत हुई। एएमयू छात्र संघ के महासचिव और अध्यक्ष के रूप में उन्होंने पहली बार अपनी नेतृत्व क्षमता साबित की। आपातकाल के दौरान उन्होंने इंदिरा गांधी सरकार की नीतियों का मुखर विरोध किया, जिसके चलते उन्हें 19 महीने जेल में भी रहना पड़ा।

1977 में जनता पार्टी के टिकट पर स्याना विधानसभा सीट से विधायक चुने गए। इसके बाद उन्होंने कांग्रेस का दामन थामा और 1980 में कानपुर से लोकसभा सांसद बने। इंदिरा गांधी और फिर राजीव गांधी सरकार में उन्होंने मंत्री पद संभाला। हालांकि, 1986 में शाहबानो मामले पर सरकार की नीति से असहमति के कारण उन्होंने कांग्रेस और मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया।

शाहबानो मामले के बाद आरिफ मोहम्मद खान ने खुद को मुस्लिम कट्टरपंथ का मुखर विरोधी और प्रगतिशील मुस्लिम नेता के रूप में स्थापित किया। यही वजह है कि बीजेपी ने उन्हें अपने करीब पाया। 2004 में उन्होंने बीजेपी जॉइन की, हालांकि लोकसभा चुनाव में सफलता नहीं मिली।

आरिफ मोहम्मद खान को बीजेपी का समर्थन इसलिए मिला क्योंकि उनके विचार तीन तलाक, समान नागरिक संहिता (UCC) और अनुच्छेद 370 जैसे मुद्दों पर बीजेपी की नीतियों से मेल खाते थे। उन्होंने हमेशा “एक देश, एक कानून” की वकालत की। उनकी प्रगतिशील छवि और मुस्लिम समाज में उनके प्रभाव को बीजेपी ने अपने लिए एक मजबूत रणनीतिक हथियार माना।

2019 में उन्हें केरल का राज्यपाल बनाया गया। अब बिहार के राज्यपाल के रूप में उनकी नियुक्ति को बीजेपी की रणनीति के तहत देखा जा रहा है। बिहार में मुस्लिम आबादी करीब 17% है और सीमांचल के इलाकों में यह आंकड़ा 40% से भी अधिक है। आरिफ मोहम्मद खान की नियुक्ति इस क्षेत्र में बीजेपी की प्रगतिशील छवि को मजबूत कर सकती है।

आरिफ मोहम्मद खान ने हमेशा कट्टरपंथ और रूढ़िवादी सोच का विरोध किया। देवबंद और नदवे जैसे संस्थानों में पढ़ाई जाने वाली इस्लामिक शिक्षा पर सवाल उठाकर उन्होंने मुस्लिम समुदाय में एक सुधारक की पहचान बनाई। उनका मंदिरों में जाना और पूजा-पाठ करना भी उनकी राष्ट्रवादी छवि को मजबूत करता है। हालांकि, मुस्लिम समाज में उनकी छवि को लेकर मतभेद हैं। जहां एक वर्ग उन्हें प्रगतिशील और सुधारवादी नेता मानता है, वहीं दूसरा वर्ग उन्हें बीजेपी और आरएसएस के विचारों से प्रभावित मानता है।

बिहार में आरिफ मोहम्मद खान की नियुक्ति को अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उनके एएमयू से जुड़े होने के कारण राज्य में पढ़े-लिखे मुस्लिम युवाओं और प्रोफेशनल्स पर उनकी पकड़ मजबूत हो सकती है। इससे बीजेपी सीमांचल और अन्य मुस्लिम बहुल इलाकों में अपने आधार को मजबूत करने का प्रयास कर सकती है।

Writer: neelamsingh116

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